राधास्वामी सम्वत् 202
अर्ध-शतक 99        सोमवार  जून 08, 2020     अंक 26       दिवस 1-7

राधास्वामी मत उपदेश

(परम गुरु हुज़ूर महाराज)

भाग आठवाँ

वर्णन हाल उपदेशकर्त्ताओं का और हिदायत मुनासिब उनके वास्ते

(गतांक से आगे)

57- जो कितने ही साधू या गृहस्थ सतसंगी इस तरह की काररवाई करेंगे, तो बहुत से जुदे जुदे ग़ोल हो जावेंगे, और एक दूसरे का आपस में इत्तिफ़ाक़ न होगा और जो वे साधू या गृहस्थ सतसंगी अपने आप को गुरु और सतगुरु थाप कर अपनी पूजा और मानता जुदी जारी करेंगे और राधास्वामी दयाल की संगत और गुरुद्वारे से, जो आगरे में है, अपना ताल्लुक़ न रक्खेंगे या मेल मिलाप छोड़ देंगे, तो कुल मालिक राधास्वामी दयाल का इष्ट और उनके चरनों की भक्ति आहिस्ता आहिस्ता कम या गुम हो जावेगी। इसमें बड़ा भारी हर्ज राधास्वामी मत के प्रकाश में वाक़ै होगा और यह भारी नुक़सान उनके सबब से पैदा होगा जो ऐसी काररवाई मनहठ और अहंकार और ख़ुदमतलबी की वजह से शुरू करेंगे और समझौती पाने पर भी उसको अपने तौर से जारी रक्खेंगे।

58- मुनासिब तो यह है, बल्कि हर एक राधास्वामी मत के सतसंगी पर फ़र्ज़ है कि जो जो राधास्वामी दयाल का इष्ट रखते हैं और राधास्वामी धाम में पहुँचना चाहते हैं, वे सब आपस में भाईचारे के तौर पर बरताव करें और एक दूसरे से भाव और प्यार के साथ पेश आवें, न कि अपने अपने उपदेशक की टेक बाँध कर कुल मालिक राधास्वामी दयाल का इष्ट भी ढीला कर दें और एक दूसरे की ईर्षा करके आपस में विरोध पैदा करें। यह बड़ी लज्जा की बात है और इस मत पर, जो कि आम भाईचारे का रिश्ता मज़बूत करने वाला है, भारी इलज़ाम लाती है और कुल मालिक राधास्वामी दयाल की मौज के बरख़िलाफ़ है।

भाग नवाँ

हिदायत उपदेशियों को

क़िस्म पहली

साधू और सतसंगियों के उपदेशियों को

59- जिस किसी के मन में सच्चे मालिक के मिलने और अपने पूरे उद्धार कराने की चाह है, उसको चाहिए कि जहाँ तक मुमकिन होवे संत सतगुरु या साधगुरु से उपदेश लेवे और जो वे न मिलें, तो उनके सच्चे प्रेमी सतसंगी से, गृहस्थ होवे या विरक्त, उपदेश लेकर अभ्यास शुरू करे और राधास्वामी दयाल का इष्ट बाँधकर उनके चरनों में प्रीति और प्रतीति बढ़ावे। वे अपनी मेहर से उसका संजोग संत सतगुरु या साधगुरु से, जब मुनासिब होगा मिला देंगे।

60- जो उसके मन में उमंग सेवा की पैदा होवे, तो तन और धन की सेवा राधास्वामी मत के साधू और सतसंगियों की भाव के साथ करे, लेकिन मन राधास्वामी दयाल के चरनों में लगावे।

61- उपदेशकर्त्ता को वक़्त लेने उपदेश के अपना गुरू न बनावे, लेकिन उसको साधन करने वाला समझ कर उसका प्यार और भाव के साथ सतसंग करे और जब जब उमंग होवे और वह मंज़ूर करे, तो तन धन की सेवा भी करे और राधास्वामी दयाल के चरनों का इष्ट बाँध कर अपना अभ्यास जारी रक्खे और संत सतगुरु से मिलने की चाह मन में रक्खे और जब मौज से वे मिल जावें, तब उनसे गहरी प्रीति करे।

62- जब संत सतगुरु से मेला होगा तब इसको घट में परचे मिलेंगे और बाहर से भी सतसंग में इसको रस विशेष आवेगा और संशय और भर्म सहज में दूर होते जावेंगे, और प्रीति और प्रतीति कुल मालिक राधास्वामी दयाल के चरनों में, और भी सुरत शब्द मार्ग की, बढ़ती जावेगी। इसी तरह आहिस्ता आहिस्ता थोड़ी थोड़ी पहचान संत सतगुरु की होती जावेगी।

63- जो कोई उपदेशकर्त्ता उपदेशी पर दावा गुरुवाई का बाँधे, या और किसी क़िस्म का ज़ोर या हुक्म चलावे, या उसको खोज और तलाश से बाज़ रक्खे और उसके संग से सच्चे परमार्थी की हालत थोड़ी बहुत न बदले, यानी प्रीति और प्रतीति राधास्वामी दयाल के चरनों में बढ़ती न जावे और संसार की तरफ़ से किसी क़दर वैराग्य या उदासीनता चित्त में न आवे, तो उस उपदेशक को सच्चा गुरू नहीं समझना चाहिए। उसके संग से उपदेशी का सच्चा और पूरा उद्धार नहीं होगा। ऐसी सूरत में उपदेशी को ऐसे उपदेशक के साथ सिर्फ़ साध भाव मानना चाहिए और पूरे गुरू का खोज वास्ते अपने पूरे उद्धार के जारी रखना मुनासिब है। और जब तक पूरे गुरू से मेला नहीं होगा, तब तक कुल मालिक राधास्वामी दयाल, जिस क़दर मुनासिब होगा, ऐसे उपदेशी की सँभाल फ़रमावेंगे और रफ़्ता रफ़्ता सतगुरु से भी मेला करावेंगे।

 (क्रमशः)