राधास्वामी सम्वत् 202
अर्ध-शतक 99      शुक्रवार   जून 05, 2020     अंक 26      दिवस 4

सतसंग के उपदेश

भाग-3

(परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज)

बचन (12)

संसार में किसी इच्छा के पूर्ण होने पर जो ख़ुशी व इतमीनान की हालत पैदा होती है उसी को शान्ति मानते हैं मगर परमार्थ में शान्ति दूसरी ही अवस्था का नाम है। यह निर्मल चेतन अवस्था और दसमद्वार की प्रज्ञा है यानी सुरत के, शरीर और मन की मैल से निवृत्त हो कर, निर्मल चेतन-मण्डल के दरवाज़े में प्रवेश करने पर आनन्द व प्रकाश लिये हुए जो ज्ञान-अवस्था प्रकट होती है उसको शान्ति कहते हैं। संसार में इच्छा के पूर्ण होने पर जो शान्ति होती है वह आरज़ी जोश का नतीजा होती है चुनाँचे जोश कम हो जाने पर वह शान्ति ग़ायब हो जाती है लेकिन जिस शान्ति की परमार्थ में महिमा है उसमें किसी क़िस्म की कमी वाकै़ नहीं होती बल्कि जब प्रेमीजन की सुरत दसमद्वार से आगे प्रवेश करती है तो उसमें तरक़्क़ी होती है। यह शान्ति प्राप्त करने के लिये मुनासिब है कि अव्वल मनुष्य अपने दिल में बसी हुई संसारी वासनाओं में कमी करे और राज़ी बरज़ा रहने की आदत डाले और फिर अपनी सुरत सहसदलकमल के स्थान पर पहुँचावे। यहाँ ज्योति का दर्शन होने पर संसार के सब प्रकाश धुँधले और तपनरूप दरसने लगते हैं और ज्योति का प्रकाश शान्तिमय भासता है। इसके बाद त्रिकुटी स्थान के धनी से, जिसका रंग लाल सूरज का बयान किया गया है और जिसे सविता कहते हैं, तअल्लुक़ क़ायम करके यहाँ के प्रकाश का अनुभव करे और फिर दसमद्वार में, जिसे परब्रह्मपद, चन्द्रविन्दुपद और चन्द्रलोक भी कहते हैं, प्रवेश करके यहाँ की शान्तिमय प्रभा का आनन्द ले। ज़ाहिर है कि इस युक्ति के सीखने और दुरुस्ती के साथ कमाने के लिये ज़रूरी है कि मनुष्य किसी ऐसे महापुरुष की शरण ले जिसे यह विद्या आती है और जिसने युक्ति की कमाई करके असली शान्ति का अनुभव किया है।

बचन (13)

लोग कहते हैं कि अगर शब्द आत्मा का गुण है तो वह हर आत्मा को आप से आप सुनाई देना चाहिये लेकिन आम लोगों को अन्तरी शब्द सुनाई नहीं देता। इसमें भूल यह है कि प्रश्न करने वाला और आम लोगों के शरीर का अभिमानी आत्मा नहीं है बल्कि जीवात्मा है जो कि आत्मा यानी सुरत व मन की मिलौनी का परिणाम है। आत्मा व जीवात्मा में ज़मीन आसमान का अन्तर है पर आम लोग जीवात्मा ही को आत्मा समझते हैं। अगर जीवात्मा ही आत्मा हो तो फिर आत्मज्ञान कठिन कहाँ रहा और उसकी प्राप्ति के लिये किसी साधन की क्या ज़रूरत रही ? जाग्रत् अवस्था में हर शख़्स को ज्ञान प्राप्त रहता है क्योंकि हर शख़्स कहता है मैं खाता हूँ”, “मैं बोलता हूँ”, अगर यह मैं ही आत्मा हो तो हर इन्सान को इस मैं का और इसकी क्रियाओं का ज्ञान आगे ही हासिल है। इसलिये ज़ाहिर है कि जीवात्मा व आत्मा में बड़ा भेद है। अन्तरी शब्द हर आत्मा को सुनाई देता है पर जीवात्मा उसे नहीं सुन सकता क्योंकि वह आत्मा का गुण है।