राधास्वामी सम्वत् 202
अर्ध-शतक 99      शनिवार   जून 06, 2020     अंक 26      दिवस 5

सतसंग के उपदेश

भाग-3

(परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज)

बचन (14)

जो लोग सतसंग का हाल समझने के लिये आवें उन्हें चाहिये कि अपने मतलब की बातों की जानिब ध्यान दें और ग़ैरज़रूरी बातों से मतलब न रक्खें। मसलन बाज़ लोग पूछते हैं कि फ़ुलाँ काम क्यों करते हो, साफ़ कपड़ा क्यों पहिनते हो। ऐसे सवालात जिज्ञासु के लिये बिल्कुल व्यर्थ हैं। उसको देखना यह चाहिये कि आया सतसंग का अधिष्ठाता संसार के सामानों में, जो उसे प्राप्त हैं, लिप्त है या नहीं और संसारी नफ़ा व नुक़्सान की सूरतों में सुखी दुखी होता है या नहीं। वह अपनी राय से काम करता है या दूसरों की समझ बूझ से काम चलाता है। वह मुश्किलों के आने पर या अपना काम चलाने में परेशान हो जाता है या अनुभव शक्ति जागृत होने से अपने सब काम आसानी व सहूलियत के साथ अंजाम देता है। अगर कोई शख़्स संसार के सामानों में लिप्त नहीं है और नफ़ा व नुक़्सान की सूरतें उसके चित्त को डाँवाडोल नहीं कर सकतीं और जो बेलाग व आज़ादाना काम करता है और मामूली समझ बूझ के बजाय अनुभवशक्ति से काम चलाता है तो समझना चाहिये कि उसको अपने मन व इन्द्रियों पर क़ाबू हासिल है और वह अपनी तवज्जुह अपनी मर्ज़ी के अनुसार अन्तर व बाहर मुख़ातिब करने में क़ादिर है। इसके बाद यह देखना चाहिये कि आया वह दिन रात संसारी कामों में उलझा रहता है या वक़्त निकाल कर परमार्थ की ज़ानिब भी काफ़ी तवज्जुह देता है। जिस शख़्स को अपने मन व इन्द्रियों पर क़ाबू हासिल है, जिसकी किसी के साथ ख़ास मुहब्बत या नफ़रत नहीं है, जो सांसारिक धर्मों के पालन के अलावा आत्मविद्या का भी शौक़ रखता है और मौक़ा मिलने पर अपने परम पिता के गुणानुवाद गाता है, जो अमीर व ग़रीब और विद्वान व मूर्ख से यकसाँ बर्ताव करता है, जो ऐसे लोगों को, जिनके अन्दर सच्चे मालिक या परमार्थ के लिये प्रेम है, अज़ीज़ रखता है और जिसकी दिली कोशिश है कि उसके संगी साथी सच्चे मालिक के सच्चे प्रेमी बन जावें, ऐसा शख़्स ज़रूर परमार्थ के रहस्यों से वाक़िफ़ है और उसके संग से जिज्ञासु को ज़रूर लाभ होगा।

बचन (15)

बाज़ लोग सतसंग की आर्थिक संस्थाओं को देख कर तर्क करते हैं कि सच्चे परमार्थ में ऐसी संस्थाओं का होना नामुनासिब है। ऐतिहासिक ग्रन्थों के पढ़ने से मालूम होता है कि कहीं पर लोगों की जमाअत क़ायम होने पर या तो उन्हें भीख माँगने की सूझी या लूट मार करने की, और इन काररवाइयों का अन्दरूनी दोष छिपाने के लिये भीख माँगने का नाम धर्म या परोपकार और लूट मार करने का नाम मतप्रचार रक्खा लेकिन राधास्वामी मत में इन दोनों का निषेध है। राधास्वामी मत की शिक्षानुसार भीख माँगकर धार्मिक संस्थाएँ क़ायम करना वैसा ही मना है जैसा कि लूट मार करके अपना पेट भरना और दूसरों को अपना हममज़हब बनाने के बहाने से उनकी दौलत पर हाथ फेरना। हर सतसंगी के लिये हुक्म है कि अपनी हक़ व हलाल की कमाई में गुज़र करे। ऐसा हुक्म जारी होने पर सतसंग का फ़र्ज़ हो जाता है कि सतसंगियों के लिये हक़ व हलाल की कमाई हासिल करने के मुतअल्लिक़ रास्ते निकाले और उन्हें ज़िन्दा मिसाल से दिखलावे कि कैसे बिला लूट मार किये व भीख माँगे बड़ी बड़ी जमाअतें अपना गुज़र कर सकती हैं। इसमें शक नहीं है कि राधास्वामी दयाल ने यह एक नई चाल चलाई है लेकिन जो लोग सतसंग की इस चाल के मुतअल्लिक़ तर्क करते हैं उन्हें चाहिये कि अव्वल इसके हर पहलू पर अच्छी तरह ग़ौर कर लें।

बचन (16)

सतसंगी के लिये सभी जीव यकसाँ हैं क्योंकि सभी मालिक के बच्चे हैं। मगर जीवों में पात्र, संस्कार या क़ाबिलियत का फ़र्क़ ज़रूर रहता है। हमारे हाथ पाँव, दिमाग़ वग़ैरह एक ही शरीर के अंग रहते हुए अलग अलग अधिकार रखते हैं। पुरुषसूक्त में जो ब्राह्मणों की पैदायश पुरुष के मुख से, क्षत्रियों की बाज़ू से, वैश्यों की रान से और शूद्रों की पाँव से बतलाई गई है उससे भी अधिकार का फ़र्क़ ज़ाहिर होता है। लेकिन चूँकि सब जातियाँ एक ही पुरुष के शरीर के अंग हैं इसलिये उनमें न कोई छोटा है, न बड़ा। उनके अधिकार में अलबत्ता फ़र्क़ है। इसलिये अगर हरएक जाति अपने अपने अधिकार के मुताबिक़ काम करे तो कुल शरीर यानी प्राणीमात्र का सहज में कल्याण हो जाय।