राधास्वामी सम्वत् 202
अर्ध-शतक 99      गुरुवार  जून 04, 2020     अंक 26      दिवस 3

सतसंग के उपदेश

भाग-3

(परम गुरु हुज़ूर साहबजी महाराज)

बचन (10)

आजकल आम लोग आज़ादी के मानी यह समझते हैं कि जो जिसके दिल में आवे सो करे। मगर विचार करो कि इस हिसाब से बच्चे व मूर्ख कितनी मुसीबत पैदा कर सकते हैं। जैसे बच्चे व मूर्ख अज्ञानतावश ऐसे काम करते हैं जो ख़ुद उनके, नीज़ दूसरों के लिये दुखदाई होते हैं ऐसे ही आम इन्सान इस तरह की आज़ादी पा कर संसार के अन्दर ऐसे उत्पात करेंगे कि ज़िन्दगी का क़ायम रहना ही मुश्किल हो जावेगा। इसलिये आज़ादी के ये अर्थ ग़लत हैं। अलावा इसके हर एक इन्सान अपनी पुरानी आदतों व वासनाओं का, अपने पुराने संगदोषों का और अपने माँ बाप की आदतों व वासनाओं का ग़ुलाम है। जब तक कि किसी को इन दोषों से छुटकारा न मिल जाय वह सिर्फ़ मुहँ से आज़ादी का नाम ले सकता है उसका अनुभव या तजरुबा हासिल नहीं कर सकता। इन्सान को असली आज़ादी तन व मन से क़तई छुटकारा हासिल करने पर मिलती है। देह में रहते हुए देहअधीन आज़ादी ही प्राप्त हो सकती है जो कि असली आज़ादी नहीं है।

बचन (11)

बाज़ लोग बुरे काम तो खुद करते हैं या काम काज करते वक्त़ ग़फ़लत या लापरवाही से तो ख़ुद बरतते हैं और तकलीफ़ या नाकामयाबी की सूरत प्रकट होने पर ज़िम्मेदारी व इलज़ाम काल या क़िस्मत के सिर डाल कर अपना इतमीनान किया चाहते हैं। इन लोगों का यह ढंग बिल्कुल नामुनासिब है। सतसंग का उपदेश यह है कि अव्वल मनुष्य पूरी कोशिश करे और अच्छी नीयत से कोशिश करे और अगर अन्त में नाकामयाबी हो तो कहे कि मालिक की मौज कामयाबी के लिये न थी या किसी काम में बिला ख़ास या पूरी कोशिश किये कामयाबी हो जाने पर कहे कि मालिक की मौज से कामयाबी हासिल हुई। इन दोनों सूरतों में मालिक की मौज का हवाला देना फ़ायदामन्द है। पहली सूरत में निरासता से रक्षा रहती है और दूसरी सूरत में अहंकार से। निरासता व अहंकार दोनों इन्सान को मालिक से हटाने वाले हैं इसलिये इन दोनों को दिल से दूर रखने के निमित्त मालिक की मौज का आसरा लेना फ़ायदेमन्द है।