राधास्वामी सम्वत् 202
अर्ध-शतक 99      मंगलवार  जून 02, 2020     अंक 26     दिवस 1

राधास्वामी मत उपदेश

(परम गुरु हुज़ूर महाराज)

भाग नवाँ

हिदायत उपदेशियों को

क़िस्म पहली

साधू और सतसंगियों के उपदेशियों को

(पिछले दिन का शेष)

64- जब संत सतगुरू मिल जावें, तो उपदेशी सतसंगी को मुनासिब है कि पहले उपदेशकर्त्ता से भी मेल बदस्तूर जारी रक्खे। लेकिन जो वे उसको संत सतगुरु की भक्ति से हटावें या उसमें विघ्न डालें, तो संत सतगुरु से अर्ज़ हाल करके और उनकी आज्ञा लेकर उस उपदेशकर्त्ता से आइंदा को मेल मिलाप ढीला कर दे, या जो मुनासिब होवे बिलकुल मौक़ूफ़ कर देवे।

65- जो वे उपदेशकर्त्ता सच्चा शौक़ परमार्थ का रखते होंगे, तो वह आप सतगुरु से मिलेंगे और अपने उपदेशी को भी मिलावेंगे। और इसमें सबकी प्रीति परस्पर बढ़ेगी और राधास्वामी दयाल के चरनों में भक्ति ज़्यादा मज़बूत होगी। और जो वे उपदेशक मानी और लोभी हैं और अपने परमार्थी नफ़े नुक़्सान का कुछ ख़याल नहीं करते, तो वे आप भी सतगुरु से नहीं मिलेंगे और न अपने उपदेशी को मिलने की इजाज़त देंगे। और जो वह उनका कहना नहीं मानेगा, तो उससे विरोध और लड़ाई करने को तैयार होंगे। ऐसे उपदेशक से सच्चे परमार्थी को मेल रखना मुश्किल होगा और उनसे एक न एक दिन नाता मुहब्बत का तोड़ना पड़ेगा, और इस हालत में उस पर किसी क़िस्म का दोष नहीं आ सकता।

भाग नवाँ

क़िस्म दूसरी

नसीहत संतों के उपदेशियों को

66- जिन लोगों ने कि संत सतगुरु या साधगुरू से उपदेश लिया है, उनको चाहिए कि संत सतगुरु या साधगुरू से गहरी प्रीति करें और होशियारी से उनका सतसंग करें। और जिस क़दर कि अंतर और बाहर के सतसंग और परचों वग़ैरह से पहचान उनकी होती जावे, उसी क़दर उनके चरनों में प्रीति और प्रतीति बढ़ाते जावें। और कुल मालिक राधास्वामी दयाल के चरनों में पूरी प्रीति और प्रतीति लावें। तब कारज उनका दुरुस्त बनेगा क्योंकि निज स्वरूप संत सतगुरु और राधास्वामी दयाल का एक ही है।

67- ज़ाहिर है कि कुल मालिक राधास्वामी दयाल के चरनों में सतसंग करके और राधास्वामी मत और उसके भेद का निर्णय सुनकर पूरी प्रतीति आ सकती है और फिर प्रीति भी उनके चरनों में, यानी अंतर शब्द स्वरूप में (जो उनका निज रूप है), की जा सकती है। और इस तरह अंतर अभ्यास और बाहर का सतसंग दिन दिन शौक़ के साथ जारी रह सकता है।          

 (क्रमशः)