राधास्वामी सम्वत् 202
अर्ध-शतक 99      बुधवार  जून 03, 2020     अंक 26      दिवस 2

राधास्वामी मत उपदेश

(परम गुरु हुज़ूर महाराज)

भाग नवाँ

क़िस्म दूसरी

नसीहत संतों के उपदेशियों को

(पिछले दिन का शेष)

68- लेकिन संत सतगुरु और साधगुरू के चरनों में एकाएक ऐसी प्रीति और प्रतीति (जब तक कि थोड़ी बहुत उनकी पहचान न आवे) नहीं हो सकती और यह पहचान उनकी दया पर मौक़ूफ़ है। चाहे वे अंतर और बाहर परचे देकर जल्द उपदेशी की हालत को (जो वह सच्चा और उत्तम अधिकारी है) बदल देवें, यानी उसको थोड़ा बहुत प्रेम बख़्श देवें, या जो वह मध्यम और निकृष्ट अधिकारी है, तो बाहर सतसंग और अंतर अभ्यास कराके आहिस्ता आहिस्ता उसकी हालत बदलें। पर इन दोनों सूरतों में उपदेशी को लाज़िम और ज़रूर है कि कुल मालिक राधास्वामी दयाल के चरनों में पूरी प्रतीति और उनकी दया का भरोसा लावे, तो उसको हर हालत में अंतर और बाहर सहारा मिलता रहेगा। और जब जब संत सतगुरु या साधगुरू की तरफ़ से उसका मन रूखा और फीका हो जावेगा, उस वक़्त राधास्वामी दयाल उसकी मदद फ़रमावेंगे, जो वह उनकी बानी का पाठ और अंतर अभ्यास यानी ध्यान और भजन करता रहेगा।

69- सतगुरु स्वरूप में पूरा पूरा भाव और पूरी प्रतीति एकबारगी आनी मुश्किल है और फिर उसका बराबर एक रस क़ायम रहना निहायत कठिन है। इस वास्ते जो कोई दानाई के साथ चाल चलेगा, यानी कुल मालिक राधास्वामी दयाल के चरनों में पूरी प्रीति और प्रतीति करेगा, तो वह किसी वक़्त सतगुरु से क़तई बेमुख नहीं होगा, क्योंकि देह रूप से सतगुरु और राधास्वामी दयाल जुदा मालूम होते हैं लेकिन निज रूप यानी शब्द स्वरूप उनका एक ही है। तो जब कोई सतगुरु से रूखा फीका हो गया और राधास्वामी दयाल के चरनों में उसका भाव बदस्तूर रहा, तो वह असल में सतगुरु से भी बेमुख नहीं हुआ। सिर्फ़ उनके देह स्वरूप की तरफ़ उसका भाव घट गया और ज़ाहिरी बरताव में रूखा फीका हो गया, पर उनके शब्द स्वरूप को, जो राधास्वामी दयाल के चरनों में प्रीति और प्रतीति रही आई, बदस्तूर पकड़े रहा और उससे बेमुखता नहीं हुई। इस सूरत में अंतर अभ्यास और बानी का पाठ करने से, जल्द या थोड़ी देर के बाद उसकी प्रीति सतगुरु के देह स्वरूप में राधास्वामी दयाल की दया से बदस्तूर हो जावेगी।   

(क्रमशः)